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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



रक्षा-बंधन


विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


आज रक्षा-बंधन का अवकाश है । नौकरीपेशा रहम़त की भी छुट्टी थी । अपने दैनिक कार्यों से निवृत होकर दोपहर अपने दोस्त प्रकाश की दुकान पर समय पास हेतू जाकर बैठ गया । वहाँ उसके परिचित व अपरिचित हिन्दू भाई आ-जारहे थे । कुछ के हाथ खाली व कुछ के हाथ राखियों से सज्जित थे । पर उसने किसी के भी हाथ में एक से ज्यादा राखी बंधी नहीं देखी । जब वह छोटा था तो उसके मित्रों , पड़ोसियों के हाथ राखियों से भरे भरे दिखते थे पर तीन घंटे के अंतराल में आज उसे सिर्फ एक बालक का हाथ ही राखियों से भरा हुआ दिखाई दिया । रहम़त ने उसे आवाज देकर बुलाया और पूछा- बेटे, क्या तुम्हारे इतनी सारी बहिने हैं ? जो तुम्हारा पूरा हाथ राखियों से भरा हुआ है । उस बालक ने झेंपते हुये कहा- अंकल जी, मेरे तो एक भी बहिन नहीं है, मैं तो अकेला हूं । ये तो पिछले कल स्कूल में 'रक्षा-बंधन' उत्सव मनाया गया था इसलिए जब से ये मेरे हाथों में बँधी हुई है । रहम़त बालक की बात सुनकर सन्न रह गया और ना जाने कहाँ खो गया । बहुत देर बाद मित्र प्रकाश के पुकारने पर उसकी तंद्रा टूटी...


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