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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



बोझ


राजन कुमार


कोई है... सररर...मैडममम... अरे देखिए न मेरे पति को क्या हो गया। कुछ बोल क्यों नहीं रहे ये। अरे कोई तो आए इधर। क्या सब के सब बहरे हो गए हैं? क्या किसी को मेरी आवाज़ सुनाई नहीं देती? आँखों में आँसू लिए तारा सिंह सवाल पर सवाल किए जा रही थीं। क्या कमी थी उसमें कि उसके अपनों ने ही उसे घर से बेघर कर दिया, दो-दो बेटे पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखा कर इस काबिल बनाया कि आगे चलकर उसका सहारा बनेंगे। बुढ़ापे में उसे किसी के सामने अपना हाथ फैलाना नहीं पड़ेगा। आज देखिए उन्हीं सपूतों ने अपने ही सगे माँ-बाप को किसी और के सामने हाथ फैलाने और गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया है।

क्या इसी दिन के लिए बेटों को बेटियों से ज्यादा अहमियत दी जाती है? माँ-बाप कितनी उम्मीदें संजोए रहते हैं अपनी संतान से कि एक दिन बुढ़ापे की लाठी बनेगा हमारा लाल। सोचते हैं- हम जिस तरह से अपने बेटे का ख्याल रखते हैं, उसी तरह हमारा लाडला भी हमारा ख्याल रखेगा। हम बूढ़े हो जाएंगे तब तुम हमारा सहारा बनोगे न मेरे लाल? निश्चित रूप से बनूँगा, मैं आप लोगों को खुद से कभी दूर नहीं होने दूँगा।

परन्तु ये सारी बातें लाल तब भूल जाता है जब उसकी शादी हो जाती है, उसके जीवन में सपनों का एक नया संसार शुरू हो जाता है। अपने ही माँ-बाप को वह अपने से दूर किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आता है। तब माँ-बाप की आधी साँसें अटक जाती हैं। सोचने लगते हैं कि क्या यही हमारा लल्ला है जो बचपन में बड़़ी-बड़ी बातें किया करता था। जब समय आया, उस बात पर अमल करने की... तो वह सब भूल गया। लाखों-करोड़ों की संपत्ति बेटों के नाम कर दी…क्यों? क्या यही दिन देखने के लिए? अगर अपनी संपत्ति का कुछ भाग दोनों बेटियों को दिया होता तो आज ये दिन नहीं देखने पड़ते। ऐसा नहीं है कि उनकी बेटियाँ उन्हें बुला नहीं रही हैं, वे अपना फर्ज बखूबी निभा रही हैं। पर तारा सिंह और उनके पति रजत सिंह किस मुँह से जाए वहाँ, जब बेटा ही घर से निकाल दे। फिर रहने के लिए बेटियों के यहाँ चले जाएं तो लोग क्या कहेंगे, ताने नहीं देंगे? इससे अच्छा तो यह आश्रम ही है। बस कुछ ही दिन हुए हैं इस आश्रम में आकर रहते हुए। रजत सिंह की तबियत भी तब ठीक नहीं थी जब उनके बेटे ने अपनी पत्नी की बातों में आकर उन्हें आश्रम में छोड़ आया। शायद इसी सदमें की वजह से रजत सिंह कुछ दिनों बाद ही चल बसे।

बेचारी तारा सिंह पति की मृत्यु के दर्द को सह नहीं सकीं। उन्होंने पति के मृत शरीर पर ही दम तोड़ दिया। मरने से पहले रजत सिंह ने एक खत लिखा था। उनकी (पति-पत्नी) मृत्यु होने पर उनके बेटे उन्हें मुखाग्नि नहीं देंगे। ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही अच्छा है।


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