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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



या फिर


डॉ प्रदीप उपाध्याय


                        
बहुत कुछ अव्यक्त सा
जरा-जरा अभिव्यक्त सा
बहुत कठिन है ये दौर
कितनी परीक्षाएँ
मौन रह जाना
या फिर 
साहस के साथ
लड़ते रहना
बहुत कुछ खो देने के बाद भी
संघर्ष करते रहना
या फिर
घुटने टेक देना
हालात के सामने
टूटकर बिखर जाना
या फिर
झूक जाना तकदीर के नाम पर
हाथों की लकीरों का 
बहाना लेकर
या फिर
खुद को साबित करना
अपनी ही राह पर
चलते रहकर
हरेक कठिन परीक्षा
से गुजरकर।।
 

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