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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



स्वप्न समर


कुंदन कुमार


 
है अति रंग, है अति उमंग 
कर जीवन का न स्वप्न दमन 
बन आशाहीन क्या पाओगे 
कर पुनः श्रम तेरा चमन 

मन की गति रोक सका है कौन 
फिर मानाश्रय आज बैठा क्यों मौन 
क्या छूट गया जो रो रहा यहाँ 
चल ढूंढ अभी जीवन जो गौन 

चल अभी वहां जहाँ कोई नहीं 
सब सोच रहे कोई ठौर नहीं 
तू खोज नई है शोध नई 
तू राह नई जा सके कहीं 

जो राह भ्रमाये है जग में बहुत 
बढ़ जंजीर कुचल तो ही अद्भुत 
कर मौत समर बरसा तू कहर 
कोई रोक सके न ऐसा स्वरुप 

बज्र बना खुद को इतना 
पर्वत का बुलंद सीना जितना 
तू स्वेद बहा, तू रक्त जला 
लगे कल्पित क्षण जैसे सपना 

अब क्या है बचा जो तेरा नहीं 
है समक्ष सभी कोई रैन नहीं 
हो तप्त भवंडर चहुंओर कई 
इसे रोक सके तू तो है वही | 
 	  

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