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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



शोर


हरदीप सबरवाल


                           	 	  
देखिये हमें, 
और हमारी बेजोड़ अभिनय प्रतिभा को 
हम भारत के तथाकथित आधुनिक बुद्धीजीवी, 
विचारधाराओ के संगीत वाध्यो से लबरेज़, 
छेड़ते है राग 
अपनी अपनी डफलियो के 
विभिन्न मंचो पर 
न्यूज़ चैनलो की चमकती स्क्रीन पर 
वाद-विवाद करते 
मुद्दा परक बातों को छोड़कर 
अन्य सभी बातें करते 
अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते 
लच्छेदार टिप्पणीयो में 
सस्ती लोकप्रियता के लिऐ 
राष्ट्रहित तक दाव पर लगाते 
यहां धार तो बहुत है पर विचार कोई नही 
इन राग लहरियो में नहीं है सगींत कोई 
बस शोर है! 
 

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