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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



प्रथा


डॉ० अनिल चड्डा


                           	 	  
कैक्टस की मानिंद 
रेगिस्तान में खड़ा हूँ मैं 
रूखी-सूखी अभिलाषाएं लिए
बादल भी बरसता है
तो ओट लेकर 
फिर भी
कुछ बूँदें तो 
पड़ ही जाती हैं 
मैं हैरान हूँ 
ख़ुदा के 
उन बाशिंदों पर 
जिन्हें एक बूंद भी 
नसीब नहीं 
पर फिर भी 
खून गहराता है उनका 
किसी की 
प्यास बुझाने को 
युगों-युगों से 
चली आ रही
ये प्रथा
आगे भी 
चलती जा रही है
कौन मिटा सकता है
वो प्रथा 
जो 
हमारे वन्शाणुओं
में रम चुकी है
युगों-युगों से!
 

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