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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



युद्ध के विरुद्ध


अमिता तिवारी


 	
जी हाँ  ! युद्ध के विरुद्ध हूँ मैं-
इस लिए नहीं की नहीं देश से प्यार मुझे
अथवा की अपनों के लिए मन नहीं डोलता है 
मेरी धमनियों में भी रक्त है वो भी खौलता है 
अपनों की शहादत पर बहुत क्रोध जागता है 
मन जोश में सीमा की और भागता है 
बदले की आग जलाती है

लेकिन
एक बात यह भी समझ में आती है 
कि 
धरित्री जननी है रक्त नहीं पचाती 
गगन जनक है रणभेरी नहीं सुहाती 

और ये भी 
कि इधर रमेश गिरे अथवा उधर रहमान 
मरती तो दोनों और केवल माएँ है

माएँ ही है जो चुपचाप शहीद हो जाती है
जीती कौमें हारी कौमें 
इस कोने में झाँक तक नहीं पाती हैं 
बस जीत -हार के जश्न मनाती हैं 
किसी के हाथ में आते हैं तगमें 
किसी को मोटी रकमें मिल जाती है 
बस केवल माएँ है जो खाली हो जाती है_

फिर फिर होती हैं पूर्वस्थिति बहाली की घोषणाएं 
फिर फिर फिर फिर संधियाँ समझोते 
किसे फिर याद रहती हैं किसी की वो मौतें_
और 
सोचना यह भी बाकी-
कि युद्ध कौन करते हैं?
कि युद्ध कौन कराते हैं ?
बिल्लियों की बाँट में बंदर कहाँ से आते हैं 
कोन हैं जो सारी रोटी ले जाते हैं? 
बिल्लियों के हाथ रीते क्यों हो जाते हैं???
जी हाँ !! युद्ध के विरुद्ध हूँ मैं
बिलकुल विरुद्ध !!
क्योकि-
युद्ध में न हारा देश हारता है 
युद्ध में न जीता देश जीतता है 
युद्ध केवल शहीदों के सूने घरों पर बीतता है
	 

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