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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



वतन की जान है हिन्दी


अजय अज्ञात


 
वतन की आन है हिन्दी , वतन की शान है हिन्दी
वतन की आत्मा हिन्दी, वतन की जान है हिन्दी ॥

सरल है व्याकरण इसका,सरल है लिखने पढ़ने में  
करें हम काम हिन्दी में,बहुत आसान है हिन्दी ॥

विलक्षण सभ्यता साहित्य का दर्शन कराती है 
जमानेभर में भारत देश की,पहचान है हिन्दी ॥

जगा कर चेतना उर में,कुशल व्यवहार सिखलाती 
कलमकारों की श्रद्धा है, धरम ईमान है हिन्दी॥ 

कहीं तुलसी की चौपाई , कहीं मीरा के भजनों में
कहीं कान्हा के मुरली की सुरीली तान है हिंदी॥
	 

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