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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



माँ फोन उठा लो


आशीष वैरागी


 
बेटों को चिट्ठियों में बातें लिखनी नहीं आती 
और माँए हैं कि फोन पे बात नहीं कर पाती।
सोने का जी नही होता,जब तक कानों में 
माँ तुम्हारे डांटने की आवाज़ नही आती।

कहानियाँ झूठी हैं, हैं अधूरी सभी लोरियाँ 
भूख मिटा नही पाती ये होटलों की रोटियां
यहां रूम है किचन है बालकनी भी है माँ
पर पता नही क्यों घर वाली बात नहीं आती।

बेटों को चिट्ठियों में बातें लिखनी नहीं आती 
और माँए हैं कि फोन पे बात नहीं कर पाती।

हमे भी बेटियों सी रसोइयां संभालना पता है 
ये राशन,ये बाज़ार भी, मोलभाव भी पता है।
तुम आओ आके देखो हम बेटो की खूबियां
हमारे भी बर्तन धोने में अब आवाज नहीं आती।

बेटों को चिट्ठियों में बातें लिखनी नहीं आती 
और माँए हैं कि फोन पे बात नहीं कर पाती।
	 

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