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वर्ष: 3, अंक 45, सितम्बर(द्वितीय) , 2018



हिन्दी गजल


बृजेश पाण्डेय बृजकिशोर 'विभात'


                           	 	  
भूख मिट सकती नहीं भोजन तो मिलना चाहिए।
वो नहीं  है ग़र  धनी  कपड़ा  तो मिलना चाहिए।१

पाँव रखने के लिए थोड़ी जमीं नहीं ग़र मिले,
धूप बारिश में कोई अपना ठिकाना चाहिए।२

हो जाएं असहाय जो उनका हृदय आहत न हो,
खीर पूड़ी  नहीं सही टुकड़ा तो मिलना चाहिए।३

पीर महसूस  कर  सके   ऐसा  फकीर हो कोई,
और नहीं कोई  मिले निर्धन निरखना चाहिए।४ 

जिसकी लाठी भैंस उसकी बात जो करता फिरे,
जो है  अपराधी उसे अंजाम दिखना चाहिए।५

सत्ता  में  मदमस्त  हैं  जो  लोभी  व्यभिचारी  हैं,
सिंहासन का दांव फिर हरगिज न लगना चाहिए।६

जो संसद में सो रहे हैं पाँव  तो   उनके   कभी,
चीर कर जो पीर  दे  काँटा  तो  चुभना  चाहिए।७

हर शहर और हर गली में आज नारे लग रहे,
शाह जो चिपका कुर्सी  उसको बदलना चाहिए।८

आग लगती है कहीं लग जाए लेकिन अब नहीं,
बढ़ते क़दमों को नहीं बढ़कर पिछलना चाहिए।९
 

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