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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



गुमनाम


नरेश गुर्जर


                          
महफिलों में चर्चे सरेआम हो रहे है, 
दोस्तो के हाथों ही हम बदनाम हो रहे हैं।

गुंजती है तालियां यहाँ बुराईयों से भरी,
बिन पिये ही खाली सब जाम हो रहे हैं।

एक वक्त था जब शहर में हमारा भी बोलबाला था,
आज हम अन्धेरों में कहीं गुमनाम हो रहे हैं।

 तस्सलियां देते है अब खुद ही अपने आप को,
 दुनिया भर के तो सिर मेरे इल्जाम हो रहे है।

 तेरी तकलीफ का ख्याल 'नरेश' रखेगा कौन,
तेरे चाहने वाले भी शुमार अब गैरों में तमाम हो रहे हैं।

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