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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



जाने कहाँ गए वो दिन


सुशील शर्मा


नदी का रास्ता कच्चा था । दोनों तरफ पेड़ों की भरमार थी । गाय, भैंसों के झुंड चरते नजर आने लगे थे। बच्चे तालाब के पानी में छपाके मार-मार के खेलने लगे थे। वह अपने नंगे पैर कोमल रेत पर घुल उड़ाते दौड़ते सबके मन को मोह रहे थे। मानों प्रकृति बच्‍चों के इस क्रिया कलापों से गाँव में नये जीवन का संचार भरने की कोशिश कर रही थी। मेरे माँ बाबूजी भी इसी गांव में अभी भी रहते मैने बहुत कोशिश की कि वो मेरे साथ शहर में रहें लेकिन वो उस कातिल शहर और उसके रिश्तों से तालमेल नहीं बिठा पाए और में अपने पैतृक गांव रहना पसंद किया गांव का कोई भी परिवार पूर्ण नहीं बचा था। किसी परिवार में कोई पुरूष बचा, किसी में कोई बच्चा, किसी में कोई भी नहीं। गाँव सिकुड़ कर छोटा और कई-कई परिवारों का एक परिवार बन गया था, दु:ख और पीड़ की इस घड़ी में हमे एक दूसरे के कितने नजदीक आ जाते है। क्‍या ये मनुष्‍य का स्‍वभाव है। आज हम एक दूसरे से जितना दूर जा रहे इस कारण कही हमारे सुख वैभव में तो नहीं छिपा। गांव उजड़ा टूटा जरूर पर अब सब मिल-जुल रिसते नातों की चार दीवारी को तोड़ एक हो गये थे। कुछ दूर जाने पर रास्ता बलुआही मिटटी से बहुत मुलायम और गुदगुदी करने वाला हो जाता था । मुझे अपना बचपन याद आ रहा था जब मैं नहाने के लिए नदी जाता था नदी का किनारा पूरा बालुमय था जो धीरे-धीरे नदी के पानी में खो जाता था । औरते-बहुँये सर के बोझ को भूल विमुग्ध सी, मुहँ मैं पल्लू दबाए सर पर घड़ा साधे मस्तानी चाल चलती थी। गायें-भैंसे ऐसे मूर्तिवत अवाक खड़ी हो जाती कि मुहँ की घास को चबाना ही भूल जाती, पक्षियों का चहकना, बहते पानी का कलरव, या हवा की गति कुछ देर के लिए विषमय, विमुग्ध हो ठहर जाती थी। चारो तरफ़ एक नीरव शान्ति गहरा जाती, जिससे फूल-पत्ते भी कुछ देर के लिए अपनी अठखेलियाँ करना भूल जाते थे बरसात को छोड़कर, नदी का निर्मल पानी बहुत दूर तक बस घुटने भर ही रहता था । रविवार की दोपहर आम के बगीचे में या नदी में मस्ती करते गुजरती थी । पहले तो नदी तक नौकर भी आता था नजर रखने के लिए पर अब पूरी आज़ादी थी । कई बार ऐसा भ्रम होता पर्वत की सुंदरता उसकी विशाल ऊंची चोटियों के कारण थी, या उसपर बिखरी धवलता के कारण गर्वित हो रही थी। कभी आप उसे खेतों में हल चलाते हुए, मंदलय से आगे चलते बैल, पीछे चलती बगुलों की कतार, जैसे बादलों को कोई धरा पर संग साथ लिए चल रहा हो। और कभी रोज की छाँव मैं होठों पर लगी मुरली से छिटकती तानें सारे वातावरण को मदहोश कर रही होती। क्‍या पक्षी, क्‍या पशु, क्‍या मनुष्‍य और दूर क्षितिज पर चमकते चाँद तारे हो या सूर्य। सब जीवन सफ़र पर्यंत सुबह से शाम अपनी यात्रा में व्यस्त हैं।ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त गांव में बचपन बीता और अब मैं शहर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में मार्केटिंग एग्जेक्युटिव हूँ ।अक्सर मां पिता जी से मिलने हम रविवार को गांव आ जाते है ।गांव आते ही हम सब उन प्राकृतिक सुंदरता में खो जाते है जिनसे शहर कोसों दूर है। जब शहर पहुंचते हैं तो वो इन्तजार करता माँ का चेहरा और बाबूजी की सलाह देतीं बातें बहुत याद आती हैं।

शहर में हर इंसान चलता फिरता नज़र आता है,नहीं चल सकता है तो चलने की कोशिश में है और भी आसान रास्ता वाहनों की सवारी,नयी नयी तकनीक से बनी नयी नवेली कारें रोज सड़कों पर अपना कब्जा जमाती हुयी, इंसान के रहने के लिए जमीन नहीं इन कारों के लिए बाकायदा एक अच्छा खासा कमरा चाहिए,सप्ताह के छह दिन बड़ी ही मसरूफियत से कटते है और एक दिन रविवार का जिसे मैं अपना मानता हूं मुझे जीवित होने का अहसास कराता है मुझे अपने बचपन मे ले जाता है मुझे अपने माँ बाप की गोद मे ले जाता है मुझे अपने गांव की सोंधी माटी से मिलवाता है जो मेरे रग रग में बसी है। मुझे यह रविवार संदेश देता है कि आज मुझे अपनी तरह का जी लो ,..बाकी तो सब आना जाना है आने जाने से याद आया ईश्वर ने ये प्रक्रिया बडे ही मनोवेग से इंसान को सिखाई है, इस आने जाने के क्रम को जीवन से हटा ले तो फिर कोई शायद किसी से नहीं डरेगा, और दुनिया एक ही होगी शायद, लोगों के आने जाने पर पाबंदी नहीं होगी..जब मरने का भय नहीं,नौकरी छूटने का भय नहीं, दूसरे देश मैं घुसने का भय नहीं मतलब सब अमृत पिए हुए हों.....फिर क्या होता इस विश्व का स्वरुप...बड़ा ही वृहत्त विषय बन जाएगा आज की भागदौड़ की ज़िंदगी में वो बचपन के खेल कहीं गुम से हो गए हैं, आज सुबह के बाद वो सुकून वाली शाम नहीं आती बल्कि सीधा रात हो जाती है, शायद अब जो बच्चे हैं वो इन खेलों के सिर्फ नाम ही सुन पाएंगे। वो गिल्ली डंडा वो वो कांच के अंटे वो अंडा डावरी वो लंगड़ी वो नदी की छिर से नदी में कूदना वो पिठ्ठू और न जाने कितने अनगिनत बचपन के खेल अगर हमने उन्हे इन खेलों की इन सुनहरी दुनिया से रूबरू नहीं करवाया तो वो कभी ये खूबसूरत यादें नहीं सहेज पाएंगे।कल रविवार को मुझे गांव जाना है मेरी माँ बाबूजी के पास क्योंकि आज से ही उनका इंतजार शुरू हो गया होगा।


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