Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



जीवन का मूल मंत्र


गंगाशरण शर्मा


एक वृद्ध एक तारा की मधुर धुन बिखेरता हुआ मस्ती में कहीं जा रहा था. सहसा एक व्यक्ति पर उसकी नजरें पड़ीं, जो सिर पर संदूक उठाए ,तनाव और थकान भरे कदमों से उसी की ओर चला आ रहा था.

वृद्ध ने उसे टोकते हुए कहा,‘भाई, तुम इतने दु:खी क्यों हो? इस संदूक को उतारकर कुछ देर आराम क्यों नहीं कर लेते! ’

बोझ व चिंता से व्याकुल वह व्यक्ति रूका तो सही, मगर सिर पर संदूक उठाए हुए ही एकतारा वाले वृद्ध को निहारता रहा.

वृद्ध ने मुस्करा कर पूछा,‘भाई, जरा मुझे भी दिखाओ कि इस भारी भरकम संदूक में आखिर रखा क्या है जो तुम्हें इतना कष्ट दे रहा है? इसे तो तुम उतारने में भी संकुचा रहे हो?’

व्यक्ति ने उत्तर दिया ,‘ इसमें मेरे जीवन के सारे दु:ख भरे हैं. कुछ अतीत के हैं तो कुछ भविष्य के. मैं इस कारण व्यथित हूं. ’

वृद्ध के आग्रह पर जब उसने संदूक खोला तो एक तारा वाला वृद्ध हक्का बक्का हो उठा. क्योंकि संदूक बिल्कुल खाली था.

वृद्ध ने उसे समझाते हुए कहा,eहम दु:खों का बोझ बेकार ही ढोते फिरते हैं. अगर वर्तमान के क्षणों को समग्रता एवं आनंदपूर्वक जी लें तो सारे दु:खों से मुक्ति मिल जायेगी. बीत रहे पल को प्रसन्नता के साथ अलविदा कहो और अनदेखे भविष्य की काल्पनिक चिंता को छोड़ दो, वर्तमान में जिंदादिली से जीना ही जीवन है. f

बस क्या था, संदूक वाले को जीवन का मूल मंत्र मिल गया. वह वहीं संदूक फेंका और अपने रास्ते में मस्ती से गुनगुनता हुआ आगे बढ़ गया.


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें