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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



विश्वास


अमित राज ‘अमित’


सलोनी ने जैसे ही दरवाजे के अन्दर प्रवेष किया, शर्माजी ने डा़ँटते हुए पूछा- ‘‘इतनी देर कहाँ कर दी? तुम्हारी स्कूल की छूट्टी हुए तो तीन घण्टे हो गये। तू अब तक कहाँ थी?’’

‘‘पापा मैं अपनी एक सहेली के घर चली गई थी।’’ सलोनी ने जवाब दिया।

‘‘तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं, घर से स्कूल और स्कूल से घर चली आया करों।’’ शर्माजी ने रौब से कहा।

‘‘पापा आप मुझे हर बार मुझे डाँ़टते रहते हो, कभी प्यार से नहीं बोलते।’’ सलोनी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा।

’’बेटा मैं तुम्हारा भला ही चाहता हूँ, बुरा नहीं। अब तुम बड़ी हो गई हो, तुम्हारा इधर-उधर आना-जाना अच्छा नहीं हैं, जमाना बहुत बदल गया है। कुछ ऊँच-नीच........................’’ शर्माजी ने समझाते हुए कहा।

‘‘पापा आप तो मुझे कैद करके रखना चाहते हो, यहाँ मत जाओं, वहाँ मत जाओं। क्या आपकों अपनी बेटी पर विष्वास नहीं?’’

‘‘बेटा तुम पर तो मुझे पूरा विष्वास है, परन्तु इस जमाने पर नहीं।’’


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