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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



पुत्र धर्म


अमित राज ‘अमित’


वो वृद्धाश्रम के बाहर, मुख्य दरवाजे के बाएँ ओर, पीपल के वृक्ष के नीचे बिछी सीमेंट की मैली-सी बैंच पर आकर बैठ जाया करते और खुली आँखों से आते-जाते राहगीरों को देखते रहते। ये उनका नित्य का कर्म सा बन गया था। उनकी निगाहें राह तकती एक टक, शायद उन्हें किसी खाष व्यक्ति का इंतजार था। एक दिन समय निकालकर मैं उनसे मुलाकात की और पूँछ बैठा- ‘‘आप हर रोज अकेले यहाँ आकर बैठ जाते हो, किसी का इंतजार है, या.............................?’’

‘‘हाँ, लेकिन किसी गैर का नहीं, अपने बेटे का।’’ उन्होंने जवाब देते हुए कहा।

‘‘वो कहाँ है?’’

‘‘अमेरिका।’’

‘‘कुछ काम-काज...................................?’’

‘‘डाॅक्टर है। उसका ही रोज इंतजार करता हूँ, शायद वह आ जाये और मुझे वृद्धाश्रम से निकालकर अपने साथ ले जाये। इसी उम्मीद के सहारे मैं यहाँ बैठा रहता हूँ। अब मेरा यहाँ दम सा घूँटता है, यहाँ कोई अपना नजर नहीं आता, सब मेरी तरह..................................’’ उनकी दास्ता सुनकर मेरी आँखें उनकी अन्दर धसी आँखों पर जा टिकी, जहाँ से दर्द आसंू बनकर सलवटे पड़े गालों पर आकर उन्हीं सलवटों में समा रहे थे और अपने निषान छोड़ रहे थे। कुछ दिनों बाद वह दिन भी आया, जब उनका बेटा वृद्धाश्रम में आया, लेकिन उनकों लेने नहीं, कफ़न में लिपटी उनकी लाष को लेने और अपना पुत्र धर्म निभाने।


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