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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



साँवली सी लड़की


तुलसी तिवारी


                                                
चिड़ियों के साथ उठ कर
जानवरों को चारा देती,
आंगन में बुहारी फेरती,
बर्तनों को चमकाती
रसोई की सुगंध से
घर मंहकाती,
बलों में कंघी उलझाये,
भैया के जूते में पाॅलिस करती,
पापा का चश्मा, मोबाइल
ए.टी. एम. कार्ड उनकी ,
ज्ेाब में डालती,
मँ के नाश्ते के साथ दआइयाँ रखती,
फटी कमीज में आस्था के टाँकें लगाती,
यूनीफाॅम में सजी,
स्ीने से बस्ता चिपकाये,
टूटी चप्पल किनारे रख कर ,
न्ंागे पैर दौड़ती,
स्कूल की घंटी से एक पल पहले,
पार्थना की लाइन में खड़ी ,
ठिगनी सी ,
संकल्प की पक्की,
फौलादी मन वाली ,
म्ंजिल पर मंजिल तय करती,
बैंक के प्रबंधक की कुर्सी पर बैठी,
झुकी आँखों से ,
फटाफट अभिलेख जाँचती,
किसी गुस्से से बल खाते ,
बूढ़े की तल्खी का
मुस्कुरा कर,
उत्तर देती लड़की,
आँखों की राह मेरे दिल में उतर जाती है,
बड़ी प्यारी लगती है ,
वह साँवली सी लड़की,
और इसलिए कि ,
इसने खुद ही खुद को बनाया है,
इसने खुद ही खुद को बचाया है,
दुनिया की जहरीली नजरों से
  

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