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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



स्वप्न से तुम


सुशील शर्मा


    
व्योम से लिपटी धरा कि 
चेतना चिर अधजगी सी। 
स्निग्ध सपनों के कलश में 
प्रीत संवरी और पगी सी। 

मौन नीड़ों में अवस्थित 
मन की अनाहत संवेदना हैं। 
मेरे अकिंचन अन्त:करण की  
तृषित स्तब्ध सी अभिव्यंजना है। 

बादलों के चुम्बनों से 
शुरू सावन की कहानी। 
बरसती सी यादें तुम्हारी  
बूंद सी झरतीं सुहानी।

मनुहार की स्निग्ध बातें 
रात का अंतिम पहर है। 
व्योमग्रासी शून्य का 
अस्तित्व तुम्हारा ही विरह है। 

अन्त:स्मित आँसुओं से 
अन्त:संयत स्वप्न बनते 
नियति के प्रतिरूप चेहरे 
सृष्टियों के जाल बुनते। 
 

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