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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



कविता में अपशब्द


रवीन्द्र दास


    
मंत्र से उतरकर शब्द
कविता में आए
पहली बार शीलभंग तब हुआ था
शब्दों का
कविता लौकिक थी
मानवीय थी
इसलिए वासनाओं से अपवित्र थी
तो भी
अर्थ रहस्य ने बचाए रखा था
शब्दों में मर्यादा
शब्द क्रमशः मानवीय होते रहे
मनुष्य
और मनुष्यता अनावृत होती रही
अब,
जब शब्द ने उठा दिया
गुप्त व्यभिचार कक्ष का पर्दा
चारों ओर से
आने लगी शिव शिव की ध्वनि
मानो,
खुल गया हो
इनके कुकृत्यों का रहस्य
अपनी छवि बचाने की जुगत में
शब्द को अपशब्द 
कविता को अश्लील
और कवि को व्यभिचारी कहने लगे
 

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