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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



देह भर नैतिकता वाले लोग


रवीन्द्र दास


    
देह भर नैतिकता वाले लोग
बौखलाए
कवयित्री की शॅार्ट्स में ली गई तस्वीर से
कि वे ताक में थे 
कई महीनों से इसे गलियाने के
नहीं तो भला
किसी को क्यों हो ऐतराज
किसी के पहनावे भर से
निंदकों में स्त्रियाँ भी थीं 
उन स्त्रियों के पास नहीं था 
सुन्दर शरीर
बेडौल हो चुकी देह को
छिपा पाता है
देह छिपाने वाला लंबा परिधान
इसके लिए
सबसे आसान है परंपरा का नाम
बेशक लंबी पोशाक में
बैठे रहते हैं
शरीरजीवी लोग
सुसभ्य लोगों के होते हैं
कई उप संबंध
वस्त्रों का क्या है
वे छोटे हों बड़े
उन्हें उतारने में 
वक्त लगता ही कितना है
कामुक इशारों के नहीं है
वस्त्रों का छोटा होना अनिवार्य
शाबासी तो उन्हें
मुक्ति के नारे को छोड़
अटक जाते हैं वस्त्रों के आकार में
यह सिर्फ मर्दवादी नजरिया नहीं
अपने बेडौल शरीर
और अपनी प्रभावहीन कविताओं के प्रति
आंतरिक विद्रोह था
कि अपने को कोसने से
बेहतर है
कोस लें उसे
जैसा हम बनना चाहें
जैसा हम दिखना चाहें
गोया नहीं है कोई
इतना भी नासमझ
कि न जानता हो सच
शरीर का 
साथ ही बौखलाए वे संयमी पुरुष
जो देखना चाहते हैं
नग्न स्त्री देह को एकान्त में
 

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