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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



आज़ाद और बेतकल्लुफ़ होंगे अल्फ़ाज़


रवीन्द्र दास


    
सारा वास्तविक इतिहास 
जो मनुष्य के कब्ज़े में है 
यौन-प्रसंग का इतिहास है
न जाने जिन्हें 
किस विध्वंस की भीति से दबाया गया है
और इसके बदले 
मर खप जाने वाले, दूसरों के इशारों पर 
नाचने वाले पुतलों 
सैनिकों और सेनाओं के आख्यानों को 
उद्घोष के साथ 
पीढ़ियों से कहा जा रहा है इतिहास
जो भी जीवित है होश में 
जो भी देखता है आईना ईमानदारी के साथ 
जो भी सुनता है अपना बोलना 
जो भी समझता है ...
वह जानता है कितना 
वह अपने लिए है 
और किस हद तक दूसरों के लिए
संसार के तमाम प्रसिद्ध ऐतिहासिक आख्यान 
यौन के ही गिर्द हैं 
पर जब उनका इतिहासीकरण हुआ 
तो दूसरे अंगों को कर दिया गया आगे
सारा वास्तविक इतिहास रति प्रसंगों का है 
तो तय है 
वे तमाम ऐतिहासिक व्यक्ति जो लिप्त होते हैं 
उन आख्यानों के चरित्र विस्तार में 
और कृष्ण-मुख-गोपन की अभिलाषा से 
विचार को बनाते हैं 
इतिहास का औजार 
जो छल है वास्तविक इतिहास से
जब कभी साहित्य में 
वास्तविक इतिहास ने पैर पसारे अपने 
शक्ति-अधीशों ने उसे 'गप्प' कहकर तिरस्कृत किया 
और अपने अपने यौन प्रसंगों से 
करते रहे वास्तविक इतिहास में छेड़ छाड़ 
और मासूम शहरी को पढ़ाते रहे 
राजा और उनके सिपाहियों के बेसिरपैर के किस्से 
और अपने रति प्रसंगों को 
लतीफों की शक्ल में करते रहे जन चेतना से वाष्पित
सारा वास्तविक इतिहास 
रति प्रसंगों का इतिहास है 
जिस दिन यह इतिहास लिपि-बद्ध हुआ 
संस्कृति का असली चेहरा दिखेगा 
उस दिन हम आज़ाद होंगे 
गोया न किसी तरह की पर्देदारी होगी 
और न ही कोई पहरेदारी 
आज़ाद और बेतकल्लुफ़ होंगे अल्फ़ाज़
मेरे और तुम्हारे
 

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