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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



विसर्जन


रश्मि सिंह


    
आज विसर्जित करती हूँ तुम्हे!!
शायद मेरा विसर्जन होगा 
तुम्हारे उस ख़ौफ़ से
जो पल -पल मुझे मजबूर करते है
कमरे के उस कोने में
सिसकने को
जो बस मेरे उस दर्द का साथी होता है 
जो तुम्हारा दिया होता है।

विसर्जन होगा तुम्हारे उन शब्दों का जो
स्त्री को बस एक देह से ज्यादा आगे बढ़ 
न परिभाषित किया होगा।

स्वाहा करूँगी तुम्हारी उन नजरो को 
जो x-रे की तरह हर वक्त भेदती है 
स्त्री देह को

और फिर स्वाहा तुम्हारी उस सोच का जो 
तुम्हारे हर अच्छे और बुरे कर्मो को 
नग्न करती हुई भेदा करती है स्त्री के 
उस अंग को जो तुम्हें तुम्हारा अस्तित्व प्रदान करती है 

आज वो वक़्त आ गया
जब विसर्जन होगा तुम्हारे 
अस्तित्व का
स्वाहा स्वाहा की
मधुर ध्वनि के साथ 
 

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