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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



इंतज़ार अब भी बाकी है


रश्मि सिंह


    
अपलक देखता रहा
अपनी ही हथेलियों को
लगता रहा हिसाब किताब

जीवन के उन "लम्हो" की जो
मैंने बर्वाद किया
हाँ ,बर्वाद ही तो किया तुम्हारे प्रेम में

अब देखो न और भी गहरी हो गई है लकीरें
तुम्हारे यादों की तरह
रेत पर जब भी रखता हूँ इन हथेलियों को
एक निशान छोड़ जाती है ये

बिल्कुल वैसे ही जैसे
तुम्हारे जाते हुए कदमों को देख कर
आँखों के कोर पर पसरा था वो निशान।

कभी मुड़ कर देखना मैं वही खड़ा हूँ 
जहाँ से जाते वक़्त तुमने
पलटना भी मुनासिब नहीं समझा।
और मेरा इंतज़ार इन लकीरों की तरह
बस गहरा होता जा रहा।
 

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