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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



ध्यानमग्न तपस्वी


रामदयाल रोहज


   
पूरब दिशा में मुँह किए
पूरे शरीर पर ओढे
बर्फ की श्वेत चादर
ध्यान मगन बैठा
पर्वत -तपस्वी
दिखाई दिया
बिलकुल धुंधला धुंधला
गगन -ललाट पर
मोतियों सी चमकी
तारागण-ओस की बूंदें
मैं एक टक देखता रह गया-
एक अद्भुत सूर्य- ज्योतिपुंज निकला
तपस्वी के ललाट से
कुछ क्षण ठहरा
तपस्वी के कंधे पर
चुपचाप कान में कुछ कहा
और चलने लगा
खुले आकाश में
सभी प्राणी निकल चुके थे
नींद के जटिल जाल से
प्रकृति में हो रहा
धीरे- धीरे परिवर्तन
तपस्वी वहीं बैठा था ध्यानमग्न
लेकिन अब उसने ओढ ली थी
भगवी चादर
और ललाट पर चमकती ओस की बूंदें
सूखकर उङ गई थी
विराट वायुमंडल में
 

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