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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



मरूधरा खण्डकाव्य (अंक-१)


रामदयाल रोहज


   
(१)
था दोनों का गजब प्यार मिलते तो बाहें खिलती थी मन्मथ की पत्नी भी जिनको देख देख कर जलती थी |
(२)
मेघ कभी भी मरूधरा की इच्छा नहीं भुलाता था जैसे सूरज देता दीप्ति प्रिया पर प्यार लुटाता था |
(३)
एक दिन बातों ही बातों में दोनों में स्पर्धा शुरू हुई श्रीमती पूछती प्रिय से पहेली ही आफत गुरू हुई|
(४)
प्रिय जिसका ठीक तरह से समझ नहीं पाए थे अर्थ तभी सहेली आँधी ने आ नारद सा कर दिया अनर्थ |
(५)
झट खड़े हुए जलराज आज युग लोचन आग समान किया "मैं त्याग रहा हूँ अभी तुम्हें तुमने मेरा अपमान किया|"
(६)
इस पल ही लो संन्यास लिया गिरी कानन में मैं जाता हूँ अब मुहँ नहीं देखूँ तेरा मैं एेसी सौंगन्ध खाता हूँ
(७)
इन शब्दों ने मरूधरा को संकटसागर में डाल दिया पाहन प्रतिमा सी बैठी प्रिय से ना कोई सवाल किया|
(८)
गिर गई गगन से जैसे वो ऐसा उसको आभास हुआ फट गया कलेजा गुब्बारे सा अब शक्ति नाश हुआ|
(९)
कुछ समय बाद संभली ;जैसे जागी वर्षों से सोकर पाकर पल में स्मृति वो बोली प्रिय से रोकर |
(१०)
हे नाथ ! मुझे मत यूं छोडो़ थोडा़ सा मुझ पर तरस करो कस्में खाई संग जीने की स्वामी ! वाणी कुछ सरस करो |
(११)
सखी आर्द्रा और सभी तरूमित्रों ने समझाया और सुबुध्दि देने को बूढ़ा पीपल भी आया |
(१२)
सुनकर भी उसने सुना नहीं चल पड़ा गगन पथ से मन में घृणा का गरल भरा चल पड़ा वात के रथ से |
(१३)
रो रोकर रात बिताती थी सारस सी विकल हुई थी अपनी किस्मत को कोस रही बदसूरत शक्ल हुई थी |
(१४)
पागल सी कहती कभी कभी ओ!प्रियतम छेल छबीले तुम कहो कथा ऐसी कोई हो हरे भरे सब टीले |
(१५)
शोर मचा श्रृंगालों ने कोसों तक राग मिलाया भयसुर के स्वागत में कुत्तों ने भी साथ निभाया |
(१६)
थी रात अमावस सी काली रजनीकर भी सोया था सहमी सी बैठी थी देवी मन यादों में खोया था |
(१७)
चहुँओर नजर थी दौड़ रही बस एक झलक पाने को मन में जिसकी मूरत बसती आकुल थी बाहँ फैलाने को |
(१८)
कह रही ओ !प्राणप्यारे अब मैं सह सकती नहीं साँसे है संकट में मेरी तनहा अब रह सकती नहीं |
(१९)
रूठते सब लोग है इसका बुरा नहीं मानती लेकिन सजा दी किस जन्म की आपने; नहीं जानती|
(२०)
इस भयावह रात से डरकर सभी छुप सो गये मुझको अकेली देख तारे भी यहाँ दुश्मन भये
(२१)
आँखों के बाणों से उन्होने सारी रात सताया ;फिर इन मनचलों को सूरज ने आकर सुबह भगाया |
(२२)
हे नाथ ! मुझे डर लगता है कैसे ?किस पर ? विश्वास करूँ कलियुग की सेना घूम रही बोलो! किसकी अर्दास करूँ |
(२३)
बिन बोले तुम चले गये लोचन इक बार मिलाते जी करता उड़कर आ जाऊँ लेकिन तुम पता बताते |
(२४)
पल पल पलकें गीली होती नयनों से निर्झर चलते है दिन रात निकलते है ऐसे जैसे कछुए से चलते है |
(२५)
रोझ ;चिंकारे देख मेरी हालत को है दुख पाते शाम सवेरे गोड़ावण मेरे मन को बहलाते |
(२६)
चिड़ी कमेड़ी तीतर सब गायक मधु लय में गाते है मधुर साज चरचरियों के मिलकर तरू ताल बजाते
(२७)
मेरा मन खोदा चूहों ने कष्टों का जाल कुतरने को आती है रोजाना रजनी विरह- अग्नि हरने को |
(२८)
लेकिन सब है प्रयास विफल हो रहा है मेरा दुख दूना पल पल दिल भरता जाता है यह कभी नहीं होता सूना |
(२९)
अब सूख रही मेरी त्वचा मानों बालू उड़ती है कहाँ बची है उठने की शक्ति जान मौत से अब लड़ती है |
(३०)
हे नाथ तुम्हे आना होगा नयना दर्शन के प्यासे है यह लिप्सा ही है मूल मंत्र इससे ही चलती साँसें है |

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