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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



तू कहाँ चली


रामदयाल रोहज


   
मन बहलाकर थोड़ा सा
ओ! मतवाली; घनपुष्प कली
तू कहाँ चली तू कहाँ चली |
तू वहाँ चली जहाँ जल रहा
अब खेत हमारा जल रहा
प्यासा पंछी अकुलाता हूँ
तेरा सानिध्य चाहता हूँ
सतरंगी चुन्नी लहराकर
दिलवाली ; सर गोद पली
तू कहाँ चली तू कहाँ चली |
यह सावन बीता जाता है
भीतर तक आग लगाता है
विरह - तक्षक सताता है
यमराजा को बुलवाता है
मेरी इस विपदा को आकर
तुम जल्दी हरो कुसुम तितली
तू कहाँ चली तू कहाँ चली |
मिट्टी है पाहन  बिन पानी
ना मिलता है दाना पानी
रूठे सब करते मनमानी
अब उतर गया मेरा पानी
मेरे इन भीगे नयनों पर
अब तो कुछ रहम करो पगली
तू कहाँ चली तू कहाँ चली |
 

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