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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



किधर छोड़ चला सावन...


कवि राजेश पुरोहित


 
महादेव के अभिषेक हो रहे थे
रोज रोज बिल्व पत्र चढ़ रहे थे

पी कर भांग सारे मग्न हो रहे थे
ॐ नमः शिवाय नाम जप रहे थे

कावड़िया सारे मन्दिर जा रहे थे
कीर्तन भजन मिलकर गा रहे थे

संगीत के साथ सभी झूम रहे थे
नर नार सारे शिवभक्त बन रहे थे

पंचामृत से  अभिषेक कर रहे थे
गंगाजल दूर दूर से ला चढ़ा रहे थे

बाग - बगीचों में झूले  झूल रहे थे
रिमझिम काले बदरा  बरस रहे थे

फुहारों में भींगे - भींग  लौट रहे थे
तेज बारिश में घर भी टपक रहे थे
 

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