Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



हवस


पीताम्बर दास सराफ"रंक"


 
मैं चिल्ला रहा था
छोड़ दो उसे
वह चार साल की बच्ची है
अबोध है
वह अकेली
तुम पांच
सह नहीं पाएगी
वह तुम्हारी हवस की आग को
मर जायगी
मत छोड़ो मानवता,सभ्यता
शालीनता गरिमा मत त्यागो
उसने भी 
वैसे ही जन्म लिया
जैसे तुमने लिया
वह किसी मां की
राजदुलारी ,बाप की प्यारी है
उसके भाई है,बहन है
रिश्तेदार हैं
सब ढूंढ रहे हैं उसे
गली गली
दर दर भटक रहे हैं
चीख रहे हैं
चिल्ला रहे हैं
कभी इससे पूछते
कभी उससे पूछते
कहीं देखा तुमने
उस नन्ही बालिका को
यहीं खेल रही थी
कूद रही थी
हॅ॓स रही थी , दौड़ रही थी
कहां चली गई
कौन ले गया
पुलिस के हाथ जोड़ें
नेताओं से मिले 
हमारी बच्ची हमें ला दो
चार साल की है वह
मासूम है
जानती नहीं
समझती नहीं
क्या होती है हवस
क्या होती है पिपासा
मर जायगी वह
अगर पड़ गई
किसी बलात्कारी के हाथों
मैं दौड़ा उसे बचाने
तो मुझे मारा
और छोड़ गए बच्ची को
चीखते चिल्लाते
वह पड़ी धरा पर
अपने आंसुओ को बहाते
मैंने उसे उठाया
चूमा
उसके आंसुओं को पोंछा
वह मेरे हाथों में
सिसक रही थी
और धीरे धीरे
तोड़ रही थी अपना दम
मैं उसकी लाश को
हाथों में ले
ढूंढ रहा था
आकाश में ईश्वर को
जिसने निर्दयता और मलिनता को
जीवन का अंग बना दिया ।। 
	 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें