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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



ऐ मेरे मन के दिये


नीतू शर्मा


                          
ऐ मेरे मन के दिये
तू हौशलों से काम ले,
आ रही आंधी इधर
खुद को जरा तू थाम ले ।
काम तेरा जलना है 
तू बस सदा जलता रहे,
इन अंधेरों को मिटाके
रोशनी करता रहे ।
जानते हो हर कदम पे
संग तेरे धोखें हुए है,
देख फिर से विघ्न कंटक 
रास्ते रोके हुए है ।
पैर छूती ऊर्मियां जो
मोहमय बाधा ही है,
है नहीं मंजिल यहाँ
यह तो सफर आधा ही है ।
राह दे पतवार से जिस 
कश्ती में तू सवार है,
है नहीं कुछ भी यहाँ 
मंजिल तेरी उस पार है ।
हार कर टूटो नहीं
तुम पे मुझे विश्वास है,
कोशिशें करते रहो
जब तक बदन में श्वास है ।

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