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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



संभल कर चलना


महेन्द्र देवांगन "माटी"


                          
कांटों से भरी है राह राही, संभल संभल कर चलना ।
पग पग में है सतरंगी जाल, बिछाये बैठी छलना ।
अगर पाना है लक्ष्य तो , आगे ही बढ़ते जाना ।
राह कठिन जरुर है , इससे न घबराना ।
चाल तेरी मंद न हो , काली रात से न डरना ।
प्रभात जरुर होगा राही , अंधियारे से लड़ते रहना ।
उदास होकर के तू अपना , गाण्डीव न रख देना ।
कौरव के छल में आकर , समझौता न कर लेना ।
आलस अत्याचार अहं के , जाल में न फंस जाना ।
कर्मठता उत्साह शांति से , ज्ञान की ज्योति जलाना ।
प्यास बुझा दो जन जन की , बनकर निर्झर झरना ।
रहम करो सभी पर , दुखियों का घाव भरना ।

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