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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



बंदिश


लवनीत मिश्रा


                          
इस डर से  कुछ कहना,
रिश्तों में नही अच्छा, 
कि बातों से कहीं मेरे,
वो नाराज ना हो जाएँ, 
यह बात बेतुकी सी,
हमको लगती है,
डर को रिश्तो मे लाना,
रिश्ते तोड देते हैं,
कहने का तरीका हो,
लहजा प्रेम का रखो,
सही गलत की बातो को,
बेबाक होकर तुम कहना,
की अपना जानकर तुमने,
जरा सा कह दिया कुछ भी,
मनाने का हुनर हो तो,
वो रूख मोड देते हैं,
इस डर से की कुछ कहना,
रिश्तों में नही अच्छा, 
की बातो से कही मेरे,
वो नाराज ना हो जाए, 
यह बात बेतुकी सी,
हमको लगती है,
डर को रिश्तो में लाना,
रिश्ते तोड देते हैं।

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