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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



मनुजाद पिया


कुन्दन कुमार


                          
मैं निर्धन था धन दे न सका 
मैं निर्मम का मन भर न सका 
मैं निर्बल था अबोध रहा 
दुष्टता दुष्ट की न जान सका 

गर जान भी जाता करता मैं क्या 
तन बेच भी आता देता मैं क्या 
लालच का मुंह कभी भरता नहीं  
ले - ले के वो कहता दिया है क्या 

मैं पिता अभागा कैसा रहा 
सुख देता रहा सुख दे न सका 
वो कह न सकी उसे चाहिए क्या 
वो मौन रही मेरा मान रहा 

जिन हांथों में पाया था उसे 
वरदान खुदा का प्यारा मुझे 
कृतार्थ हुआ मैं धन्य हुआ 
तुझे देखा करूँ तृष्णा न बुझे 

घर रौनक था मन आकुल था 
तुझे देखने को जग ब्याकुल था 
मुस्कान तेरा प्रशमित कर दे 
तू जो भी कहे सब माकूल था 

चहुंओर प्रेम  कहीं  गम न था 
कोई आँख कभी भी नम न था 
सुरभित वायु उड़ती थी सदा 
सपनो का देश घर पिता का था 

कुछ अद्भुत सा ये माया है 
हर ओर विचित्र सब काया है 
है प्रेम अनन्य है रूप नया 
सर्वस्व नया घर पिया का है   

प्रफुल्लित सी मैं ख़ुश थी अति 
उल्लसित सी खोई थी मति 
था जादू कोई मदहोश थी मैं 
था प्रिये को देना पथ में गति 

मेरा समस्त बसा उसी क़दमों में 
बन पुष्प बिछी उन चरणों में 
मेरी खुद की कोई चाह न अब 
थी पूर्ण समर्पित उन्हीं आंगनों में 

एक काला दिवस ऐसा आया 
मनुजाद मनु के मन छाया 
वो दैत्य लोभ का दानव था 
था लूटने मेरा वो जग आया 

जो चाहिए था देती कैसे 
धन पिता का वो लाती कैसे 
सब दे ही दिया थे देते रहे 
अब चूस लहू जीती कैसे 

असाध्य बज्र का भार सहा 
कटुशब्द हृदय मेरा भेद गया 
झुलसाई गयी मैं खाक हुई 
जग पिता का मैं निष्प्राण हुई |  

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