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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



पृथ्वी की प्रकृति


डा० कनिका वर्मा


                          
पृथ्वी की इस प्रकृति ने दिया है हमें जीवन दान
पृथ्वी की मिट्टी के हर कण ने दिया है ये वरदान
पृथ्वी ने सींच कर दी पौधों को असीस
पृथ्वी ने अपने द्रव्यों से बनाया हमें रईस

पृथ्वी के आंगन में खेलते सागर और नदियाँ
पृथ्वी के सीने पे सजे पर्वत और वादियाँ
पृथ्वी की कोख में छुपे हैं रहस्य हज़ार
पृथ्वी के मौसमों से झूमती जीवन में बहार

पृथ्वी की प्रकृति में हैं प्रेम के अनेक रंग
फूलों का सौंदर्य और महक देता है उमंग
पृथ्वी के सीने में बोई जाती है कनक
पृथ्वी की पेशानी पे खिलखिलाता है धनक

पृथ्वी ने दिल में बसाया बारिश की बूँदों सा अपनापन
पृथ्वी ने ही जुदाई में दिखाया मरुस्थल सा सूखापन
पृथ्वी में है स्वयंभू के निर्माण की बहार
पृथ्वी में ही है शिव के त्रिशूल सा संहार

पृथ्वी के प्यार में किसी को परखा नहीं जाता
क्योंकि परखने से कोई अपना नहीं रहता
पृथ्वी के राज में तो अशर्त ही प्रेम बँटता है
सूरज हो या चाँद, सही वक़्त पे नभ में उतरता है

पृथ्वी की प्रकृति में कुछ भी ज़ल्दबाज़ी में नहीं घटता
फिर भी हर प्रक्रिया और निर्माण सहजता से पूरा होता
पृथ्वी ने श्रम से प्रकृति के हर रूप में ज़िन्दगी बसाई
जीवन के हर कण में है पृथ्वी के प्रेम की परछाई

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