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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



साक्षी


कमला घटाऔरा


                          
कितने बेगुनाहों के खून के
 
साक्षी हैं  हम

मगर हमारी गवाही

स्वीकारी नहीं जाती
क्यों कि ,

कानून बिक चुका है 

गुनहगारों के हाथों ।
 

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