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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



रक्षाबंधन


कवि जसवंत लाल खटीक


                          
राखी का त्यौहार आया , 
                  संग में खुशियां हजार लाया ।
भाई-बहन का सच्चा प्यार ,
                      एक धागे में पूरा समाया ।।

बहन अपने पीहर आयी ,  
                    घर में फिर से रौनक छायी ।
बाबुल के बगिया की चिड़िया ,
                    फिर से घर में बहार लायी ।।

सबके चेहरे खिले-खिले ,
                  हंस-हंस कर सब बात़े करते ।
सब बचपन को याद करके , 
                    साथ रहने की आस करते ।।

माथे पर तिलक लगा कर ,
                     कलाई पर राखी बांधती है ।
जीवन भर प्यार के संग , 
                 और रक्षा का वचन मांगती है ।।

बहन कहती है अपने भाई से ,
                        एक वचन मुझे तुम देना ।
कभी भी शराब मत पीना , 
                 और अपनो को दुख मत देना ।।

कहती है मेरे प्यारे भैया , 
                  तुम राखी की लाज रख देना ।
मां- बाप की सेवा करना ,
                और उनको दुःख तुम मत देना ।।

गाड़ी तुम धीरे चलाना, 
             हेलमेट हमेशा पहन कर चलाना ।
घर पर राहें तकते नन्हें बच्चें , 
                      उन पर खूब प्यार लुटाना ।।

बहन तो इतना ही चाहती है , 
                      अपने घर का मान बढाती ।
बहन बड़े ही प्यार से , 
             भाई की कलाई पे राखी सजाती ।।

बहन बेटी जिस घर में होती ,
                        उस घर में खुशियां आती ।
भ्रूण हत्या क्यों करतें हो , 
                    बेटी ही सब रिश्ते  निभाती  ।।

बेटियां नहीं होगी घर में तो  ,
                          तुम्हें राखी बाँधेगी कौन ।
ये त्यौहार भी मिट जाएगा  , 
                        सिर्फ यादें ही रहेगी मौन ।।

जिस बहन के भाई नहीं  है ,
                       ये भाई "जसवंत" है तैयार ।
बांधकर रक्षा का बन्धन , 
                  मनाओ सब राखी का त्यौहार ।।
 

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