Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



अधूरी ख़्वाहिशें


कवि जसवंत लाल खटीक


                         
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी , 
जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।
कुछ अरमानों की झोंपड़ियाँ , 
मजबूरियों से ढ़ह गईं ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी 
...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।

बचपन में देखे थे मैने , 
बड़े-बड़े और प्यारे सपने ।
लेकिन जवानी में आते-आते ,
सपनों की दुनिया बह गईं ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।

कोशिश बहुत की थी मैंने ,
बड़ा अफसर बन जाने की ।
वक्त के आगे एक ना चली ,
बस घर की जिम्मेदारी रह गईं ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।

सपने में गड़गड़ाहट हुई ,
उम्मीदों की बिजलियां भी चमकी ।
लेकिन किस्मत की बारिश से जमीन ,
अंदर से सुखी रह गयी  ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

कभी थी मरने की ख्वाहिश ,
कभी होती जीने की इच्छा ।
इस जिंदगी की कशमकश में ,
नैया , डूबती-डूबती रह गयी ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गयी ।।।

वो दिन भी देखे थे मैंने , 
जब यमराज मेरे पास से गुजरे ।
शायद कुछ उपकार किये थे हमने ,
तभी फिर से , ये जिंदगी रह गईं ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।

छोटी सी उम्र है लेकिन ,
छाछ , फूँक-फूँक कर पीता हूँ ।
तजुर्बों से आया  फ़न लेकिन ,
ख्वाहिश , अधूरी रह गईं ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।

सूट-बूट और पीए-सीए ,
सरकारी गाड़ी की ख्वाहिश ।
लेकिन किस्मत का खेल निराला ,
कलम हाथ में रह गईं।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।

थाम ले , "जसवंत" तू कलम ,
और निरन्तर लिखता जा ।
देख फिर सुहाने सपने  ,
ये कलम मुझसे कह रही ।।
कुछ ख्वाहिशें थी मेरी
 ...................जो सिर्फ ख्वाहिश बन कर रह गईं ।।।
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें