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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



एक कविता


डा. गोरख प्रसाद मस्ताना


                         
अक्षरों का फूल चंदन
शब्द जब ले करें वंदन
बनी कविता 
बूंद शीतल बने वर्षण
रश्मियों का सुघर नर्तन
धूप का हो सुनहलापन
विहग वृन्दों का हो गायन
बनी कविता
जब हवाएँ भरे चंदन
शिल्प बिम्बों का हो स्यन्दन
कल्पना में भाव नूतन
कलम का भी हो समर्थन
बनी कविता 
दर्प से हो दूर तनमन
साधना ही बने साधन
लक्षणा का दीप प्रज्वलन
व्यन्जनामय गीत गुंजन
बनी कविता  
ह्रृदय में आनन्द वर्धन
हो सुवासित मनन चिंतन
सर्वदा परमार्थ लेखन
नयन से करुणा का तर्पण
बनी कविता
 

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