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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



सारी रैना रोते बादल


डॉ दिवाकर दत्त त्रिपाठी


      
घूमा  करते   हैं,  आवारा ।
जैसे कोई गम का  मारा ।
थक कर फिर ये झुक जाते हैं,
जैसे कोई पथिक  हो  हारा।

रात रात चपला चिल्लाती ,
भला कहाँ हैं,सोते बादल ?
सारी रैना रोते...............


जब वियोग,घन नैना,तरसे।
उर पीड़ा कहने को बरसे।
दादुर, झींगुर, मोर , पतंगे,
घन के दुख में ,अतिशय हरषे।

पुरवाई का छोर थामकर ,
अपना दुखड़ा ढोते बादल ।
सारी रैना ...................

ये धरती का रुप सजाते ।
धानी चूनर ले के आते ।
यह नवयौवन दे  देतें  हैं
सर सरिता सारे बलखाते।

मरकत मणि सा चमका देते,
पत्ता- पत्ता  धोते  बादल ।
सारी रैना ...................

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