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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



सपना


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा 'द्रोण'


     
रात गुमसुम रही तन भी बेसुध रहा,
तुमसे सपनों में बातें यूँ करता रहा।
न ही आहत हुई न खुली आंख है,
जाने क्यूँ ये बदन भी अकड़ता रहा।
जब खुली आँख तो पाया कुछ भी नही,
नजरें कुछ खोजती सी तड़फती रही।
पास आकर भी क्यों दूर जाते रहे,
क्या शिकायत रही क्या खता हो गई।
यूँ न आया करो स्वप्न में तुम मेरे,
दूर जाता हूं में याद जाती नही।
बीते लम्हे भुलाना हुआ मुमकिन है,
सामने आकर क्यों अब मिलते नहीं।
वक्त ने दूरियों को यूं बदल सा दिया,
मन रहा पास है तन का साया नहीं।
इस तरह ख्वाब में तुम न आया करो,
दिल तड़फता है फिर दर्द रुकता नहीं।
 

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