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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



चलचित्र !


ध्रुव सिंह 'एकलव्य'


   
आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

थी धवल केश-सी चिरपरिचित 
बन भूत-सी मिटती स्याही की 
बनकर आई है,साँझ वही 
कुछ ख़्वाब नवल थे..........   

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................   

माथे हैं चिन्हित झुर्रि-सी, यौवन भूत की अंगड़ाई 
कर कोमल बीती सदियाँ थीं , पाषाण उर अवशेष बने थे 
कह दूँ प्रियतम ! कैसी हो तुम ?
संकेत बने थे ......... 

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

वह काल था सुन्दर क्षणभर 
जब तू आई थी 
मैं हारा-हारा रहता, 
तू शरमाई-सी
भागा-भागा मैं फिरता,
तू कतराई-सी  
चट्टी की चाय पे बैठा,
मनमाने दिन थे 
पीछा करता, तू भागे 
अनजाने दिन थे .........

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

डेरे डाले रहता था, मैं छत के ऊपर 
कभी श्वान-सा लेटा-लेटा, नाले पर जाकर 
बन धवल चन्द्रिका आई, 
तू बनकर उस क्षण 
पलभर में सदियाँ जी ली !
तुझे दूर से पाकर 
तुझको क्या बतलाऊँ ? ओ प्रियतम !
रात तिमिर में स्वप्न लिए 
वे कैसे दिन थे !

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

बाइस्कोप-सी आँखें , मंडराई फिरती 
मंद-मंद मुस्काती 
अधरों से पेंच लड़ाती 
मुँह में थी, केश चबाती 
मैं लुटा-लुटा करता था 
जलसे के दिन थे ......... 

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे................... 

मैं इधर-उधर भागा था, पुरवाई बनकर 
एक चीख़-सी गूँजी नभ में, शहनाई बनकर 
डोली उठी थी तेरी, रुसवाई बनकर
खोया-खोया मैं रहता
तन्हाई बनकर 
हृदय से फूटी धारा,
गूँगे-से पल थे.........

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे................... 

कितनी बार था झाँका ! मधुशाला मैंने 
उठता-उठता मैं गिरता, आवारापन में 
पर लाख दुआएं माँगी , इस क्रोधित मन से 
कैसे बतलाऊँ, ओ प्रियतम ! 
बड़े टेढ़े दिन थे.......... 

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे................... 

अब टिप-टिप करती बूँदें नलियों से आतीं  
फिर बारिश की वो रिमझिम, स्मरण कराती 
अंतर है ! भींगता मैं हूँ 
तू देख न पाती 
बोतल की लड़ियाँ टँगी हुईं, नित तेरे करतल 
थोड़ा जी ले ! ओ प्रियतम ! 
मैं आज बुलाता 
निज नयन से क्षणभर कह दे !
बड़े अच्छे दिन थे .........  

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................

श्वेत साज पर लेटी, तेरी मोहक काया 
नहीं आज उठाने कोई ,परदेशी आया 
व्यग्र हुआ मैं आज कि तुझको फिर थामूँगा 
कांधे पर रखूँगा कई बार तुझे 
और मैं गाऊँगा। .........

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................
 

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