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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



शब्द चितेरा


अशोक दर्द


  
मैं भी होता शब्द चितेरा ,कोई बात न्यारी लिखता |
होरी की दुःख - गाथा लिखता , धनिया की लाचारी लिखता ||
 
बाप - बेटे या भाई - भाई में , रिश्ते आखिर बिखरे क्यूँ |
धन – बल - सत्ता की खातिर , क्यूँ हो रही मारामारी लिखता ||
 
सभ्य शहर की गलियों में , क्यों मंडराए काले साए |
क्यों फैले हैं गली मोहल्ले भय भूख बीमारी लिखता ||
 
काट - काट कर पेट को जिसने ,  सुखद बुढ़ापा चाहा था |
वृधाश्रम में घुट कर फिर क्यों , उसने उम्र गुजारी लिखता ||
 
मीलों सड़कें खोदीं फिर भी क्यों ,  पैदल चलना हिस्से आया |
अन्न उगाकर भूखे रहना , उनकी व्यथा यह सारी लिखता ||
 
अपना सर्वस्व लुटाया जिसने , मां  - भगिनी -  बेटी - कांता बन |
फिर क्यों बांधे खड़ी बेड़ियाँ , इस दुनिया में नारी लिखता ||
 
बरसों पन्ने पलटे फिर भी  , दफ्तर - दफ्तर घूम रहे |
शिक्षित युवा -  हाथों ने क्यों , पकड़ी आज बेकारी लिखता ||
 
न लिखता परियों की बातें  - न ही राजा रानी की |
भोग रहे जो हम तुम दोनों , अपनी और तुम्हारी लिखता ||
 

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