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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



यादों की जिद


डॉ० अनिल चड्डा


 
अभी भी

दर पर यादें खड़ी

दस्तक देती रहती हैं

और 

जिद करती हैं

दिल के

अंदर आने की

पर मैं

मजबूर हूँ

उन्हें फिर से

अंदर आने 

नहीं दे सकता

बहुत कम

जगह रह गई है

मेरे दिल में

वर्तमान के 

रिश्तों के चलते

अब कहाँ

उन यादों को

जगह दे पाऊँगा

दिल में अपने


 

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