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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



गाड़ी छूट रही है।


आशीष वैरागी


 
धड़कन बढ़ी,घटी है।
साँसे कुछ बैचैन रहीं है,
दिल बैठा है यूँ कुछ, 
जैसे गाड़ी छूट रही है।

                     नींद भरी है आँखो में 
                     और पलके नामंजूरी है
                     करवट चार बदल दी लेकिन
                     जागना भी जरूरी है 
                     घबराहट है यूँ कुछ 
                     जैसे कॉपी खाली छूट रही है।
                     दिल बैठा है यूँ कुछ, 
                     जैसे गाड़ी छूट रही है।

वादे सब बेमतलब फिर से
प्यार की फिर से ढैया चाल
यक़ीन,भरोसा,क्या मतलब 
जब इश्क बेहया निकले यार
गुम है आज ख़ुशी फिर यू कुछ
मंतर माला टूट रही है
दिल बैठ है यूँ कुछ, 
जैसे गाड़ी छूट रही है
 

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