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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



हाइकु युगलिका


शुचि भवि


     
मानव तुम
मत भूलो प्रभु को
भला तुम्हारा।
ईश स्मरण
करता है सफल
जन्म तुम्हारा।

***
मन चंचल
भटके हरपल
इसे सँभालो।
देखे सपने
हायपोथेटिकल
अरे सँभालो।।

***
धर्म सिखाता
मिलकर रहना
है मानवता।
मानव फिर
क्यों दर्शाते रहते
हो दानवता।।

***
जीवन देखो
कितना है सुंदर
झूमे बहार।
झूमकर ही
तुम सब भी  गाओ
राग मल्हार।।

***
रिश्ते बदले
ये जिसकी ख़ातिर
वह पैसा है।
अपना लेना
सबको ही मानव
जो जैसा है।।

***
माना बहुत
तलातुम आये हैं
भवि न डरी।
जीवन कश्ती
 तूफानों से हमेशा
भवि की लड़ी।।

***
तुम सँग ही
बंधी है अब देखो
प्रेम की डोर।
तुम बिन न
दिखता है मुझको 
जीवन छोर।।
 

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