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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



'हो संघर्ष भले ही कितना
जीने की हमने ठानी'


सतविन्द्र कुमार राणा


    
बदरा छाए दिखते नभ में
धरती पर पानी-पानी
हो संघर्ष भले ही कितना
जीने की हमने ठानी।

धरती को घेरे हुए, दिखता चहुँदिश नीर
जीव जगत को दे रहा, यह बहुतेरी पीर
यह बहुतेरी पीर, गाँव तक ये भर आया
जंगल हो या राह, इसी में दिखे समाया
'सतविंदर' पर चाह, राह का सिरजन करती
जो करता संघर्ष, भोगता है वह धरती।

उसके आगे देखो पड़ती 
मुश्किल को मुँह की खानी।

साथी हो जब साथ में, हर मुश्किल आसान
हरे पीर वह धूप की, सुख का छाता तान
सुख का छाता तान, बचाता है बारिश से
 सच्चा मरहम प्रीत, सुरक्षा दे खारिश से
'सतविंदर' है साच, दीप का जीवन बाती
सहज सहें सब कष्ट, साथ जब सच्चा साथी।

निर्मल मन की नेह धार का
होता है क्या जग में सानी?
 	  

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