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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



तेरी यादों की गहराई बहुत है


शुचि भवि


    
तेरी यादों की गहराई बहुत  है
भरी महफ़िल में तन्हाई बहुत  है

मिली आज़ादी लेकिन बंधनों की
रही आदत जो दुखदाई बहुत है

मिलेगा प्रेम सच्चा एक दिन तो
न सोचें ऐसा रुसवाई बहुत है

लिखें कितने ही पन्नों में ग़म कोई
यहाँ पैसे की सुनवाई बहुत है

सँभल ऐ दिल ज़रा अब तो यहाँ तू
फिसलने के लिए काई बहुत है

किसी मुफ़लिस ने भूखे दम है तोड़ा
नमी अश्कों की क्यों छाई बहुत  है

सदाक़त की करें हम बागबानी
शजर भवि इसका फलदाई बहुत है
 

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