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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



मारकर ठोकर बढ़ा है


नरेंद्र श्रीवास्तव


                          
बरसों से यही चलता आ रहा है सिलसिला।
मारकर ठोकर बढ़ा है,राह में जो भी मिला।।

हर बार आँसू पोंछकर, मुस्कुराना चाहा मैंने।
पर रुलाकर ही बढ़ा है,राह में जो भी मिला।।

जब भी बाहें फैला के,ललक के लिपटना चाहा।
मारकर झापड़ बढ़ा है,राह में जो भी मिला।।

उनींदी आँखों में जब भी, ख़्वाब उजले कोई आये।
झिंझोड़कर ही बढ़ा है,राह में जो भी मिला।।

थका तो चाहा मैंने,बैठ तनिक आराम लूं।
खींचकर कालर बढ़ा है,राह में जो भी मिला।।

पूछना चाहा कि कब तक, यह चलेगा सिलसिला।
धुतकार कर ही बढ़ा है,राह में जो भी मिला।।

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