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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



प्यासा कोई भटका बहुत था


डॉ आरती कुमारी


 
हमारी छत पे जल अटका बहुत था
हमें इस बात का खटका  बहुत था

तबाही देखते बनती थी इसकी,
कि इसने शह्र को गटका बहुत था

कोई कश्ती कोई पेड़ों पे बैठा,
कोई खम्बों से भी लटका बहुत था,

न देखी  ज़ात भी  मज़हब न देखा,
सभी को आब ने पटका बहुत था

जिधर देखा उधर पानी था फैला 
मगर प्यासा कोई भटका बहुत था		 
 

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