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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



दोहे रमेश के


रमेश शर्मा


 	
इत देखूंँ परिवार या, उत देखूँ मै देश !	
जीवन के बाजार मे,ऐसा फँसा रमेश ! !

पिछड़ेपन की देश मे,ऐसी चली बयार !
लगी हुई है होड़ सी , बनने की लाचार !!

कर लेगें सब ठीक है, गठबंधन स्वीकार ! 
किसे कहें पर आपका, बतलाएँ सरदार !!

बुरे भले के बीच का, जिन्हे नही है भान ! 
उनकी भी मंशा यही, मै भी बनूँ प्रधान ! !

ऐसी कैसी लालसा ,नेताओं की आज !
चाहे जैसे भी मिले, रहे उन्ही का राज !!

इच्छाएँ मरती नही,...मर जाता इंसान !
यही समूचा सत्य है,इसे समझ नादान !!

जिसके रहते खो गया.,जीवन का अनुराग !
ऐसी ख्वाहिश का करें,फौरन ही परित्याग !!

विद्या से बढकर नही, उत्तम और निवेश !
चाहे जितनी कीजिए, दौलत जमा रमेश ! !

बचकाना हरकत करें,नाजायज व्यवहार !
लोगों मे उनका रहे,. सदा निम्न किरदार! !

पता नही किस वक्त क्या,दे दें दुष्ट बयान! 
काबू मे जिनकी कभी,रहती नही जबान !!

करते हो निंदा अगर,रहे हमेशा ध्यान !
होते हैं तुम मान लो,.दीवारों के कान !!

क्या होंगे उस द्वार के, सोचो तो हालात ! 
लौटी हो आकर जहाँ, सजी धजी बारात !!

बढती गई किसान की, दिन पर दिन जब पीर!
मेघों ने अपना स्वंय, ........दिया कलेजा चीर! !
 

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