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वर्ष: 3, अंक 44, सितम्बर(प्रथम) , 2018



बालगीत : एक बूंद


राजपाल गुलिया


  
चिंकू  बोला आज  मेघ  से ,
              बंद करो ये शोर !

काहे  गड़गड़  करते  आते ,
सारे  नभ  में  दौड़   लगाते .
मुझे डराने की खातिर  तुम ,
कैसा   कैसा   रूप   बनाते ,
बेशक  छोटा  बच्चा  हूँ  पर ,
           समझो ना कमजोर !

कितने हो तुम तन के काले ,
झूठी   शान   दिखाने  वाले .
खूब   गरजते  नहीं  बरसते ,
लोगों   को   भरमाने   वाले .
बुला   रहे    देकर  आवाजें ,
            तुम्हें  धरा के मोर !

आसमान में  बिजली कड़के ,
देख  उसे   दिल  मेरा  धड़के .
पानी  दो  गुड़  धानी  दे   दो ,
सुनकर तुम क्यों हम पर भड़के .
सच पूछो तो  मुझको अब ये ,
              लगे बड़ी सरज़ोर !
 

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