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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



सूरज मेरे आँगन उतरा है


बृज राज किशोर 'राहगीर'


 
माथे की  बिंदिया  का रूप  धरे,
सूरज   मेरे   आँगन   उतरा   है।
सुर्ख़ लाल सिमटी सी गठरी में,
निर्धन  के घर  में धन  उतरा है।।

          अनदेखी,     अनजानी   पगडण्डी,
          मन जिस पर पग धरते सकुचाया।
          एक  छुअन भर से तन  सिहर उठा,
          संकोचों    ने     दामन    फैलाया।
          प्रथम मिलन की  थोड़ी  घबराहट,
          भुजपाशों   में   कम्पन  उतरा   है।।

आलिंगन के बंधन में  बँधकर,
यौवन की  देह  कसमसाई है।
अधरों  ने अधरों  के  कानों में,
प्यास की कहानी  दुहराई  है।
पोर पोर श्वांसों की गंध बसी,
तन में ज्यूं चन्दन वन उतरा है।।

         लहरों में बहने को निकले तो,
         गहराई  कहाँ  नज़र आई  है।
         नस नस में वीणा के  तारों ने,
         रोज़  नई नई  धुन बजाई है।
         पायल ने  कुछ ऐसे सुर छेड़े,
         मेरे  भी  पग  नर्तन  उतरा है।।

कुछ  सपने तो  उड़ान  हैं  नभ की,
कुछ   सपने   अपने   सिन्दूरी  हैं।
'राहगीर' बिन  प्रयास  के जग में,
इच्छाएँ   होती    कब    पूरी   हैं।
सपनों को सच करने की ख़ातिर,
श्रम  बनकर  संसाधन  उतरा  है।।

         नयनों   में   साँवरे  सलोने  की,
         प्यारी   सी   मूर्ति   बसाई   है।
         दूर  कहीं  मधुवन के झुरमुट में,
         कान्हा   ने  बाँसुरी   बजाई  है।
         जिह्वा पर सुमिरन की माला से,
         मन  में  ही  वृन्दावन  उतरा  है।।
 

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